नूरपुर किले के भीतर, पश्चिमी छोर के कोने में स्थित है ब्रिज राज स्वामी मंदिर। एक छोटे से द्वार से
होकर जब मैं मंदिर के प्रांगण में प्रवेश करता हूँ, तो सामने सदियों पुराना विशाल बरगद का पेड़ श्रद्धालुओं का स्वागत करता हुआ प्रतीत होता है। दाईं ओर एक छोटा सा पार्क बना है, जिसके चारों ओर छोटी-छोटी चारदीवारियाँ हैं। ठीक सामने यज्ञशाला है और बाईं ओर एक छोटा सा लंगर हॉल। दाईं ओर बने पार्क के साथ-साथ चलते हुए लगभग 50 फुट आगे जाकर दाईं ओर मुड़ते ही मुख्य मंदिर स्थित है।
इस पवित्र मंदिर में प्रवेश करते ही अत्यंत शांति का अनुभव होता है। मंदिर के भीतर सामने भगवान की मूर्तियों के दर्शन कर नतमस्तक होने के बाद, मंदिर के ऊपरी मुख्य भाग में जाने के लिए बाईं ओर बनी सीढ़ियाँ ऊपर की ओर जाती हैं।
2125 फुट की ऊँचाई पर बसे नूरपुर शहर के इस किले में स्थित ब्रिज राज स्वामी मंदिर प्राचीन काल में यहाँ नहीं था। जैसा कि हमने पिछली कड़ी में जाना, पुराने समय में यह मंदिर किले के दरबार-ए-खास वाले हिस्से में स्थित था।
यद्यपि यह किला 10–11वीं शताब्दी में बना था, परंतु उस समय इसका दरबार-ए-खास मंदिर नहीं था। इसे मंदिर का स्वरूप देने की कहानी भी अत्यंत रोचक है।
बताया जाता है कि यह घटना 1619 से 1623 के बीच की है, जब इस किले पर राजा जगत सिंह का शासन था। उसी समय वे चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) के राजा के निमंत्रण पर चित्तौड़गढ़ गए थे। जैसे हम अपने मित्रों के पास जाते हैं, वैसे ही राजाओं के मित्र भी राजा ही हुआ करते थे। राजाओं के आपसी रिश्ते भी राजघरानों में ही होते थे, ठीक वैसे ही जैसे आजकल के राजनेता अपने बच्चों के रिश्ते अन्य राजनेताओं के परिवारों में तय करते हैं। जनता को भले ही ये धर्म के नाम पर लड़वाते रहें, परंतु ये नेता अपने बच्चों के रिश्ते धर्म से ऊपर उठकर सत्ता के गलियारों में प्रभाव रखने वाले परिवारों में करते हैं।
नूरपुर के राजा जगत सिंह पठानिया राजपूत थे, जबकि चित्तौड़गढ़ का राजवंश सिसोदिया राजपूत था। इस प्रकार दोनों राजा राजपूत थे, इसलिए उनके बीच निकटता होना स्वाभाविक था।
खैर, बात को आगे बढ़ाते हुए बताया जाता है कि राजा जगत सिंह चित्तौड़गढ़ के राजा के जिस महल में ठहरे थे, उसके पास ही एक मंदिर था। रात के समय उन्हें उस मंदिर से भजन सुनाई देते थे। राजा के साथ उनके पुरोहित भी गए हुए थे।
राजस्थान के चित्तौड़गढ़ राजघराने में ही मीराबाई जी का विवाह हुआ था। उनका जन्म लगभग सन् 1500 के आसपास माना जाता है। वे श्रीकृष्ण भगवान की महान भक्त थीं।
जब राजा जगत सिंह ने रात में भजन और घुँघरुओं की आवाज़ सुनी, तो उन्होंने इस विषय में अपने पुरोहित से चर्चा की। पुरोहित की सलाह पर, वापसी के समय राजा जगत सिंह ने चित्तौड़गढ़ के राजा से श्रीकृष्ण भगवान और मीराबाई जी की मूर्तियाँ माँगीं। वे इन मूर्तियों को अपने साथ नूरपुर ले आए और किले के सबसे प्रमुख भाग दरबार-ए-खास में स्थापित किया। इसी स्थान को बाद में ब्रिज राज स्वामी मंदिर का रूप दिया गया। किंतु 1905 में आए भूकंप में यह स्थान बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया, जिसके बाद यह मंदिर वर्तमान स्थान पर नए सिरे से बनाया गया।
सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर पहुँचने पर श्रीकृष्ण भगवान की काले संगमरमर से बनी, राजस्थानी कला से प्रभावित भव्य मूर्ति के साथ-साथ मीराबाई जी की मूर्ति के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। पुजारी से प्रसाद ग्रहण कर मैं पुनः नीचे आ जाता हूँ।
यहीं एक मौलसरी का पौधा भी लगा हुआ है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यह भी राजा जगत सिंह चित्तौड़गढ़ के राजा से मूर्तियों के साथ भेंट स्वरूप लाए थे।
मंदिर के आगे की ओर एक और पार्क है, जहाँ से दूर-दूर तक पहाड़ियों के सुंदर दृश्य दिखाई देते हैं और नीचे बह रही चक्की नदी की सहायक धारा भी देखी जा सकती है। इसके साथ ही नीचे की ओर एक और मंदिर बना हुआ है, जिसके चारों ओर का मैदान सुंदर घास से ढका है और आकर्षक लैंडस्केप तैयार किया गया है। यहाँ कुछ युवा लड़के-लड़कियों का समूह भी घूमने आया हुआ है।
मेरी नूरपुर किले की यात्रा यहाँ समाप्त होती है, लेकिन वापसी से पहले मैं यहाँ का एक और इको पार्क देखने के लिए निकल पड़ता हूँ।
जारी रहेगा…
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