नूरपुर शहर की जिस गली से मैं शहर के एक ओर से मुख्य सड़क से अंदर दाखिल होकर किले तक
पहुँचा था, उसी गली से अब मैं शहर के दूसरे छोर की ओर निकलकर मुख्य सड़क पर आ गया। इसी तरफ नूरपुर का बस अड्डा स्थित है। यहाँ मैंने नूरपुर के ईको पार्क का रास्ता पूछा। एक स्थानीय दुकानदार ने बताया कि बस वाले से पूछ लेना, अगर ईको पार्क के आगे उतार दे तो ठीक, वैसे पैदल भी ज़्यादा दूर नहीं है।
मैंने पैदल ही जाने का फैसला किया। थोड़ा आगे कांगड़ा वाली सड़क पर एक मोड़ मुड़ते ही ईको पार्क का गेट दिखाई देता है। गेट के पास ही खुशी नगर गांव का बोर्ड भी लगा हुआ है। 10 रुपये की टिकट लेकर मैं अंदर प्रवेश करता हूँ। यह पार्क हिमाचल प्रदेश सरकार के वन विभाग द्वारा विकसित किया गया है। प्रवेश द्वार तो काफ़ी सुंदर बनाया
गया है, लेकिन अंदर की पहली झलक थोड़ी निराश करती है, क्योंकि लगातार देखरेख की कमी साफ़ नज़र आती है।
मैं पार्क की पगडंडियों पर चलने लगता हूँ और ऊँचे-लंबे पेड़ों तथा झाड़ियों से भरे एक छोटे से जंगल में पहुँच जाता हूँ। प्रकृति प्रेमियों के लिए यह देखने लायक जगह है। अंदर पूरी शांति है। शायद इसी शांति के कारण यहाँ प्रकृति प्रेमियों से ज़्यादा प्रेमी जोड़े आते हों। मैं कुछ पेड़ों और फूलों की तस्वीरें लेता हूँ और पगडंडियों की घुमावदार राहों पर आगे बढ़ता रहता हूँ।
राजस्थान के कुछ परिवारों में आज भी यह परंपरा देखने को मिलती है कि जब घर के बड़े सदस्य (जैसे
ससुर या जेठ) पास से गुजरते हैं तो बहू दीवार की ओर मुँह करके खड़ी हो जाती है। पार्क में एक जोड़ा आपस में बातें कर रहा था। मेरे कदमों की आहट सुनकर युवती ने दूसरी ओर मुँह फेर लिया और जैसे-जैसे मैं आगे बढ़ता गया, उसने पीठ मेरी ओर किए रखी, मानो वह नहीं चाहती हो कि कोई अनजान उसका चेहरा देखे। मुझे लगा जैसे मैं यहाँ अकेला ही “जेठ” बनकर आ गया हूँ।
ईको पार्क का यह छोटा-सा चक्कर लगाकर मैं वापस सड़क पर आ जाता हूँ। कांगड़ा की ओर से आ रही बस को हाथ देकर रोका। कंडक्टर से पूछा तो उसने बताया कि बस जसूर जाएगी। मैंने जसूर की टिकट ले ली। जसूर पहुँचते ही तलबाड़ा जाने वाली बस भी मिल गई।
रास्ते में अपने पढ़ाई के दिन याद आ गए, क्योंकि कई गांवों से स्कूल की छुट्टी के बाद घर लौटते विद्यार्थी बस में चढ़ते दिखाई दिए। लड़कियों की संख्या लड़कों से अधिक थी। वे पाँच-पाँच रुपये की टिकट ले रहे थे। हमारे समय में तो छात्रों की अलग टिकट नहीं लगती थी। साथ ही वे सभी कंडक्टर और ड्राइवर भी याद आ गए, जिनकी बसों में बैठकर पढ़ाई के दिनों का सफ़र तय किया था।
यहीं मेरी नूरपुर की यात्रा समाप्त होती है। जल्द ही किसी नए सफ़र के साथ फिर मुलाक़ात होगी।
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