Monday, December 1, 2025

नूरपुर (जिला कांगड़ा) यात्रा भाग 1

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        एक ठंडी सुबह बस धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ रही थी। दिल्ली से चंबा जा रही इस बस में एक तरफ दिल्ली का एक बड़ा परिवार बैठा था, जो हिमाचल में एक शादी में शामिल होने जा रहा था। यह परिवार हिमाचली नहीं था, बल्कि दिल्ली में इनके पड़ोसी, जो हिमाचल के मूल निवासी हैं, उनकी बेटी की शादी में पहली बार हिमाचल आ रहे थे। तीन वाली सीट पर मेरे साथ इस परिवार का एक सदस्य मेरे बाईं तरफ बैठा था, जबकि दाईं ओर लगभग छह दशक की उम्र पार कर चुका एक और व्यक्ति सफ़र कर रहा था।


        दिल्ली वाले परिवार के लोग आपस में बातें कर रहे थे, और उसी से पता लगा कि वे शादी में जा रहे हैं। उनके बच्चों की बातों से लग रहा था कि वे हिमाचल की धाम खाने को लेकर बहुत उत्सुक हैं। धाम हिमाचल में शादी-ब्याह के मौके पर दी जाने वाली दावत को कहते हैं, जिसमें मुख्य रूप से चावल, दाल और माणी शामिल होती है।

        जैसे ही बस पंजाब से हिमाचल में दाखिल हुई, मेरे दाईं तरफ बैठे व्यक्ति के चेहरे पर एक अलग ही मुस्कान फैल गई। वह सहज स्वभाव से हमसे बातचीत करने लगा, जो अभी तक लगभग 10–15 मिनट चुप था। बस जब पोंग डैम के बांध के ऊपर बनी सड़क से होकर गुजरने लगी, तो वह उत्साह से हमें डैम दिखाने लगा। दूर तक फैले पानी का दृश्य बेहद मनमोहक था।

        सर्दियों में तो इस डैम के इलाके में विदेशों से कई किस्मों के प्रवासी पक्षी भी आते हैं। भले ही यह डैम कुछ किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हो, लेकिन यहां से सिंचाई के लिए जाने वाला पानी लाखों एकड़ खेती के लिए वरदान है। पंजाब, हरियाणा और राजस्थान की अर्थव्यवस्था का असली आधार हिमाचल–पंजाब सीमा पर बने ऐसे बड़े-बड़े डैम ही हैं।

        दिल्ली वाले परिवार ने यहाँ की साफ हवा और दिल्ली के प्रदूषण की तुलना करते हुए टिप्पणी की। साथ बैठा हिमाचली व्यक्ति, जो स्वयं दिल्ली में नौकरी करता है, भी किसी रिश्तेदार की शादी में शामिल होने आ रहा था। अपने प्रदेश की तारीफ सुनकर उसके चेहरे पर और चमक आ गई—आख़िर कोई उसके जन्मस्थान की सराहना कर रहा था।

        तभी तक बस खजियाड पहुँच चुकी थी। हिमाचली व्यक्ति ने सहजता से पूछा कि आप लोग वेज खाते हैं या नॉन-वेज? फिर वह खुद ही बताने लगा कि खजियाड में मछली बहुत स्वादिष्ट मिलती है—“अगर खाते हो तो यहाँ की मछली ज़रूर खाकर जाना।”

        थोड़ा आगे बढ़ते ही मानगढ़ गाँव आ गया, और दिल्ली वाला बड़ा परिवार वहीं उतर गया। अब मेरे और उस हिमाचली सज्जन के बीच बातचीत और गहरी होने लगी। उसका गाँव आगे लगभग 20–30 किलोमीटर पर था, और मैं इस इलाके के स्थानीय पहलुओं के बारे में उससे अधिक जानकारी लेना चाहता था।

        वैसे, मैं बता दूँ कि मैं इस बस में तलवाड़ा से जसूर तक का सफ़र कर रहा था।

चलता…


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