नूरपुर किले की यात्रा – भाग 5
मैं धीरे–धीरे किले के मुख्य द्वार की ओर बढ़ता हूँ। सबसे पहले थाना आता है, जो किले के एक हिस्से में बना हुआ है, उसके बाद तहसीलदार का दफ्तर। इसके आगे अदालत है। इस सड़क पर कई अर्जीनवीस सड़क किनारे आश्रय बनाकर अपने कंप्यूटर और प्रिंटर लगाए बैठे हैं। काफी चहल–पहल है। कई लोग उनसे अपनी अर्जियाँ लिखवा रहे हैं। काले कोट पहने वकील भी इधर–उधर आते–जाते दिखाई देते हैं। यह सब कुछ किले के परिसर के बाहरी हिस्से में ही है।
किले की मुख्य ड्योढ़ी की ओर मुड़ते ही एक छोटे पार्क में घोड़े पर सवार स्वतंत्रता सेनानी वज़ीर राम सिंह का बुत (प्रतिमा) ध्यान खींचता है। उस पर लिखे विवरण को मैं पढ़ने लगता हूँ।
वज़ीर राम सिंह पठानिया का जन्म 10 अप्रैल 1824 को माता इंदोरी देवी और पिता वज़ीर श्याम सिंह पठानिया के घर हुआ था। उस समय नूरपुर के राजा वीर सिंह की मृत्यु हो चुकी थी और उनके राजकुमार जसवंत सिंह की उम्र केवल 10 वर्ष थी। अंग्रेज़ों ने इतने छोटे राजकुमार को राजा स्वीकारने से मना कर दिया। भारतीय रियासतों को अपने अधीन करने के लिए अंग्रेज़ अक्सर ऐसी ही चालें चलते रहते थे। महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद सिख राज्य को हथियाने के लिए उन्होंने किस प्रकार की साज़िशें रचीं—यह सब हम जानते हैं। महाराजा रणजीत सिंह के उत्तराधिकारी दलीप सिंह से भी अंग्रेज़ों ने इसी तरह राज्य छीन लिया था।
अपने विचारों की कड़ी तोड़कर मैं दोबारा प्रतिमा पर लिखी इबारत पढ़ने लगता हूँ।
राजकुमार को राजा न मानने पर वज़ीर राम सिंह पठानिया ने 500 साथियों सहित 14 अगस्त 1848 की रात को ममनू कैंट में अंग्रेज़ों पर हमला कर दिया और कंडी दुर्ग (किले) पर कब्ज़ा कर लिया। 15 अगस्त 1848 की सुबह उन्होंने वहाँ फहरा रहा अंग्रेज़ी झंडा उतारकर जला दिया और अपने राज्य का झंडा फहरा दिया। उन्होंने घोषणा की कि 10 वर्षीय जसवंत सिंह नूरपुर रियासत के राजा होंगे और वे स्वयं उनके सेनापति रहेंगे।
इसके बाद वज़ीर राम सिंह पठानिया ने अंग्रेज़ों को पंजाब की दिशा में खदेड़ना शुरू कर दिया। परिणामस्वरूप अंग्रेज़ों ने एक बड़ी सेना इस विद्रोह को दबाने के लिए भेजी। कोपड़ा की पहाड़ियों में भीषण युद्ध हुआ जिसमें अंग्रेज़ सेना को हार का सामना करना पड़ा।
अंग्रेज़ी सरकार ने आंदोलन को खत्म करने के लिए ब्रिगेडियर व्हीलर को कलकत्ता से और एक अन्य सेना लाहौर से भेजी। डले की धार पर 16–17 जनवरी 1849 को भीषण गुरिल्ला युद्ध हुआ। कहा जाता है कि इस युद्ध में वज़ीर राम सिंह पठानिया ने अपनी ‘चंडी’ नाम की तलवार से जॉन पील और कई अंग्रेज़ अफसरों को मौत के घाट उतार दिया।
युद्ध में हारने के बाद अंग्रेज़ों ने कुछ लोगों को लालच देकर वज़ीर राम सिंह पठानिया को उस समय घेर लिया जब वे पूजा कर रहे थे। फिर भी उन्होंने पकड़े जाने से पहले छह अंग्रेज़ सैनिकों को मार गिराया। बाद में अंग्रेज़ों ने उन्हें देश निकाला देकर रंगून भेज दिया, जहाँ 11 नवंबर 1856 को देश के इस महान सपूत का निधन हो गया।
पंजाब के राजकुमार दलीप सिंह के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था — एक बार वतन से दूर किए जाने के बाद अंग्रेज़ों ने उन्हें कभी भारत लौटने नहीं दिया। मुझे बार–बार महाराजा रणजीत सिंह के इतिहास की याद आने लगती है, क्योंकि कभी इस क्षेत्र पर एक सिख राजा का धर्मनिरपेक्ष शासन था। नूरपुर रियासत से जो 1848–49 में हुआ, वैसा ही व्यवहार लगभग 10 वर्ष पहले से लाहौर दरबार में किया जा रहा था। अंग्रेज़ उस समय भारत की आखिरी स्वतंत्र रियासत पंजाब को दुनिया के सबसे बड़े उपनिवेश में बदलने के लिए घिनौनी चालें चल रहे थे।
किले के मुख्य द्वार पर बैठा एक कर्मचारी आने वाले पर्यटकों की एंट्री कर रहा है। पहचान पत्र देखकर वह मेरे नाम को अपने रजिस्टर में लिखता है और अंदर जाने का संकेत देता है। किला देखने की कोई फीस नहीं है। इसे पुरातत्व विभाग ने संरक्षित स्मारक घोषित किया हुआ है। जिस किले को अंग्रेज़ों ने साज़िशों से जीता था, आज उसके द्वार पर तिरंगा शान से लहरा रहा है। मैं द्वार से अंदर की ओर बढ़ जाता हूँ।
(जारी)
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