Wednesday, December 3, 2025

जसूर से नूरपुर किले का सफ़र—पहाड़ों, लोगों और प्रकृति से मुलाक़ात : नूरपुर किले की यात्रा भाग 4

        हिमाचल वाले यात्री के फोन की घंटी बजती है। उसके भतीजे की कॉल थी। वह पूछ रहा था कि

बस अड्डे पर पहुँचने में कितनी देर लगेगी। अब उसका बस अड्डा बस आने ही वाला था। उसका गाँव मुख्य सड़क से हटकर था और उसका भतीजा उसे लेने आने वाला था। फोन काटकर वह अपना बैग संभालता है और मुस्कान के साथ विदा लेता हुआ लगभग डेढ़ घंटे की साझा यात्रा के बाद अपने बस अड्डे पर उतर जाता है। न हम कभी पहले मिले थे और पूरी संभावना है कि दोबारा भी मुलाक़ात न हो। यात्राओं की मुलाक़ातें अक्सर ऐसी ही होती हैं। जीवन भी एक यात्रा ही तो है। जीवन में भी ऐसे ही कुछ अनुभव बार-बार होते रहते हैं।

 

      इसके बाद जसूर तक मैं सड़क किनारे देखते हुए सफ़र करता रहता हूँ। जसूर में एक टी-प्वाइंट जैसा बनता है। तलवाड़ा की दिशा से आने पर बाईं ओर सड़क पठानकोट जाती है और दाईं ओर नूरपुर होते हुए कांगड़ा को। बस कंडक्टर इशारे से सड़क के दूसरी ओर खड़ी बसों की तरफ़ इशारा कर वहाँ से बस पकड़ने को कहता है। हालाँकि जसूर का छोटा सा बस अड्डा आगे था, पर यह टी-प्वाइंट ही असली बस अड्डे का काम करता है।

        जसूर में एनडीआरएफ की 14वीं बटालियन का मुख्यालय भी है। भले ही यह एक छोटा कस्बा सा लगता है, लेकिन एनडीआरएफ की भूमिका प्राकृतिक आपदाओं के दौरान बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। 2023 और 2025 में आए बाढ़ के समय फ़ाज़िल्का ज़िले में अपनी ड्यूटी के दौरान मैंने इस फ़ोर्स के कामकाज को क़रीब से देखा। प्राकृतिक आपदाओं के समय लोगों की जान बचाने में इनका योगदान बेहद अहम हो जाता है।

        


पर प्रकृति जो हम पर इतनी मेहरबान है, वही आपदा कैसे बन जाती है? जसूर में फ़्लाईओवर बन रहा है। इस कारण ट्रैफिक धीमा है, जिस कारण मैं सोचने लगता हूँ।  पहाड़ी राज्यों में तेजी से सड़क नेटवर्क को मजबूत किया जा रहा है। इसकी ज़रूरत भी है, पर यह कोशिश पहाड़ों की सुंदरता को बिगाड़ भी रही है और पर्यावरण के लिए चुनौती भी है। पहाड़ों को काट-काटकर सड़कें चौड़ी की जा रही हैं। निकला हुआ मलबा घाटियों, नालों और नदियों में फेंक दिया जाता है। बारिश के पानी के साथ यही मलबा आगे जाकर या तो बांधों में जमा होकर उनकी जल भंडारण क्षमता घटाता है या नदियों में जाकर उनके प्रवाह को बाधित कर बाढ़ का कारण बनता है। असल में इंसान ही है जो प्रकृति को वरदान से अभिशाप बनने पर मजबूर कर देता है।

        जसूर से बस पकड़कर मैं नूरपुर की टिकट लेता हूँ। कंडक्टर से कह देता हूँ कि वहाँ उतार दे जहाँ किला नज़दीक हो। थोड़ी ही दूरी पर नूरपुर आ जाता है। मुख्य सड़क पर एक छोटा सा बाज़ार है—लगभग 50 दुकानें—जहाँ कंडक्टर मुझे उतार देता है।

        मैं किले का रास्ता पूछता हूँ। दुकानदार सामने मुख्य बाज़ार वाली गली की ओर इशारा कर देता है। यह करीब 12–15 फुट चौड़ी गली है और यही असल में नूरपुर का मुख्य बाज़ार है। यह गली पहाड़ी पर बसे इस शहर के बीच से होकर घूमती हुई वापस उसी मुख्य सड़क पर उतरती है, जबकि मुख्य सड़क शहर का चक्कर लगाकर दूसरी ओर पहुँचती है।

        आधी गली तक लगातार चढ़ाई है, कहीं-कहीं तो काफी तीखी चढाई । हर तरह की दुकानें सजी हैं। एक मंदिर के पास पहुँचकर मैं फिर रास्ता पूछता हूँ तो एक दुकानदार एक तंग गली की ओर मोड़ते हुए कहता है—“इधर से चले जाओ, पहले कॉलेज आएगा फिर किला।”

        थोड़ी और चढ़ाई के बाद सरकारी कॉलेज का गेट दिखाई देता है। लड़के-लड़कियाँ गेट के पास खड़े हैं। करीब 50 कदम चलने पर दाईं ओर किले के टूटी हुई दीवारें दिखाई देती हैं और बाईं ओर चक्की नदी की सहायक धारा विशाल नाग की तरह लहराती हुई किले के नीचे से होते हुए पश्चिम की ओर जाती दिखाई देती है। थोड़ी दूर जाकर यही धारा चक्की नदी में मिल जाती है। मैं किले के मुख्य द्वार की ओर मुड़ जाता हूँ—वही किला जो 1000 साल पुराना है और जिस पर महाराजा रणजीत सिंह का भी राज रहा है।

चलता.....

अगला भाग पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें 

इस श्रंखला का तीसरा भाग पड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें 

इस श्रंखला का प्रथम भाग पड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें 

ਪੰਜਾਬੀ ਵਿਚ ਪੜ੍ਹਨ ਲਈ ਇੱਥੇ ਕਲਿੱਕ ਕਰੋ

To read in English Click Here 

No comments:

Post a Comment

ਪੰਜਾਬ ਦਾ ਸਭ ਤੋਂ ਉੱਚਾ ਸ਼ਿਵ ਮੰਦਰ

ਅਪ੍ਰੈਲ ਮਹੀਨੇ ਦੀ ਇਕ ਸ਼ਾਮ। ਮੈਂ ਤਲਵਾੜੇ Talwara ਤੋਂ ਸਫਰ ਸ਼ੁਰੂ ਕੀਤਾ। ਮੰਜਿਲ ਸੀ, Punjab ਦਾ ਸਭ ਤੋਂ ਉੱਚਾ ਸ਼ਿਵ ਮੰਦਰ Shiv Temple । ਵੈਸੇ ਤਾਂ ਇਸ ਮੰਦਰ ਤੱਕ ...