हिमाचल वाले यात्री के फोन की घंटी बजती है। उसके भतीजे की कॉल थी। वह पूछ रहा था कि
जसूर में एनडीआरएफ की 14वीं बटालियन का मुख्यालय भी है। भले ही यह एक छोटा कस्बा सा लगता है, लेकिन एनडीआरएफ की भूमिका प्राकृतिक आपदाओं के दौरान बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। 2023 और 2025 में आए बाढ़ के समय फ़ाज़िल्का ज़िले में अपनी ड्यूटी के दौरान मैंने इस फ़ोर्स के कामकाज को क़रीब से देखा। प्राकृतिक आपदाओं के समय लोगों की जान बचाने में इनका योगदान बेहद अहम हो जाता है।
जसूर से बस पकड़कर मैं नूरपुर की टिकट लेता हूँ। कंडक्टर से कह देता हूँ कि वहाँ उतार दे जहाँ किला नज़दीक हो। थोड़ी ही दूरी पर नूरपुर आ जाता है। मुख्य सड़क पर एक छोटा सा बाज़ार है—लगभग 50 दुकानें—जहाँ कंडक्टर मुझे उतार देता है।
मैं किले का रास्ता पूछता हूँ। दुकानदार सामने मुख्य बाज़ार वाली गली की ओर इशारा कर देता है। यह करीब 12–15 फुट चौड़ी गली है और यही असल में नूरपुर का मुख्य बाज़ार है। यह गली पहाड़ी पर बसे इस शहर के बीच से होकर घूमती हुई वापस उसी मुख्य सड़क पर उतरती है, जबकि मुख्य सड़क शहर का चक्कर लगाकर दूसरी ओर पहुँचती है।
आधी गली तक लगातार चढ़ाई है, कहीं-कहीं तो काफी तीखी चढाई । हर तरह की दुकानें सजी हैं। एक मंदिर के पास पहुँचकर मैं फिर रास्ता पूछता हूँ तो एक दुकानदार एक तंग गली की ओर मोड़ते हुए कहता है—“इधर से चले जाओ, पहले कॉलेज आएगा फिर किला।”
थोड़ी और चढ़ाई के बाद सरकारी कॉलेज का गेट दिखाई देता है। लड़के-लड़कियाँ गेट के पास खड़े हैं। करीब 50 कदम चलने पर दाईं ओर किले के टूटी हुई दीवारें दिखाई देती हैं और बाईं ओर चक्की नदी की सहायक धारा विशाल नाग की तरह लहराती हुई किले के नीचे से होते हुए पश्चिम की ओर जाती दिखाई देती है। थोड़ी दूर जाकर यही धारा चक्की नदी में मिल जाती है। मैं किले के मुख्य द्वार की ओर मुड़ जाता हूँ—वही किला जो 1000 साल पुराना है और जिस पर महाराजा रणजीत सिंह का भी राज रहा है।
चलता.....
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