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बस लगातार जसूर की ओर बढ़ रही है। सड़क किनारे लगे पेड़-पौधे पीछे की ओर भागते हुए प्रतीत हो रहे हैं। सड़क के किनारे छोटे-छोटे खेत हैं। गेहूं की बुवाई हो चुकी है, लेकिन कहीं भी गेहूं को ‘कोर’ (बुवाई के बाद पहली सिंचाई) नहीं लगी थी। खेतों में सूखापन था क्योंकि कई दिनों से बारिश नहीं हुई थी। कहीं-कहीं खेत की एक कोने में सब्जियों की खेती भी दिख रही थी।
खेतों में पिछली फसल मक्की के डंठल सर्दियों के दौरान पशु चारे के रूप में उपयोग करने के लिए संभालकर रखे हुए थे। किसी घने पेड़ के नीचे इन्हें इस तरह बांधा गया था कि बारिश का पानी इस सूखे चारे को कम से कम खराब करे और साथ-ही-साथ नीचे की ओर बह जाए। वहीं कहीं-कहीं धान की पराली भी गोल-गोल ढेर बनाकर जमा की हुई दिखाई दे रही थी।
मैं सहयात्री से यहाँ की खेती-बाड़ी के बारे में पूछता हूँ। वह मानो अपने हिमाचल के बारे में मुझे हर बात बताने को उत्सुक हो। पीछे छूट गए पोंग डैम की ओर इशारा करके बताने लगा कि डैम के पास वाले इलाकों में, जहाँ बरसात के मौसम में पानी खेतों के बिल्कुल करीब तक आ जाता है, वहाँ लोग धान भी लगाते हैं। बाकी ऊपर की तरफ मक्की उगाई जाती है। वह कांगड़ा ज़िले के पंजाब से लगते हिस्सों की खेती के बारे में जानकारी दे रहा था।
उसने बताया कि खेत भले ही छोटे हैं, लेकिन खेती अब ट्रैक्टरों से ही होती है। इसका सबूत था कि इन करीब 60 किलोमीटर के सफर में मैंने ट्रैक्टरों की तीन एजेंसियाँ देखीं। यानी जहाँ ज़रूरत होती है वहाँ बाज़ार खुद बन जाता है—जहाँ मांग होगी, व्यापारी वहाँ दुकान जरूर खोलेगा।
फिर वह खुद ही बताने लगा कि अब खेती यहाँ घट रही है। इस इलाके में लोग खेती छोड़ रहे हैं। मैं हैरानी से पूछ बैठा कि ऐसा क्यों? क्योंकि पंजाब में अक्सर लोग कहते रहते हैं कि किसानों से ज़मीन छीनकर कंपनियों को देने की कोशिशें चल रही हैं, और यहाँ के लोगों का अपनी ज़मीन और खेती से भावनात्मक जुड़ाव होता है। लेकिन यहाँ लोग खेती क्यों छोड़ रहे हैं—मेरी जिज्ञासा बढ़ती है।
वह बताने लगा कि इस इलाके में हिरन, जंगली सूअर और बंदर किसानों के लिए बहुत बड़ी मुसीबत हैं। हिरन बकरी की तरह पूरा खेत चट कर जाते हैं, जंगली सूअर खेत से फसल और सब्जियाँ उखाड़ जाते हैं, और बंदर भी फलों व सब्जियों का काफी नुकसान करते हैं। इसलिए खेती करने के बजाय लोग खेत यूँ ही खाली छोड़ रहे हैं। दूसरा, यहाँ भी नई पीढ़ी मिट्टी से जुड़कर खेती करने को तैयार नहीं है। हालांकि वह कहता है कि हमारी उपज ज़हरों और रासायनिक खादों से काफी हद तक सुरक्षित रहती है। मुझे भी अपने खेत याद आ गए—जंगली सूअरों से तो हम भी बहुत परेशान हैं।
बस अगले अड्डे पर फिर रुकती है और हमारी बातचीत का सिलसिला टूट जाता है।
चलता.....
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