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भले ही बस दिल्ली से चंबा तक के बहुत लंबे रूट पर चल रही थी, लेकिन जैसे ही वह हिमाचल में दाखिल हुई, यह लगभग हर गाँव के बस–स्टॉप पर रुकने लगी। इस कारण सफ़र बहुत धीमी गति से पूरा हो रहा था। मैं अपने साथ सफर कर रहे हिमाचली यात्री से बात करता हूँ, तो वह बताता है कि तलवाड़ा से जसूर जाने वाली इस सड़क के किनारे अब आबादी तेजी से बढ़ रही है। इस मुख्य सड़क से हटकर बसे गाँवों के लोग भी अब सड़क के पास आकर रहने लगे हैं, क्योंकि सड़क के आसपास ही रोज़गार के अवसर मौजूद हैं। वह बताता है कि इस सड़क के साथ लगती जमीन की कीमत भी अब बहुत बढ़ चुकी है।
मैं गाँवों के जीवन के बारे में पूछ ही रहा था कि अगले पड़ाव के पास एक गुम्बदनुमा बड़ी पानी की टंकी दिखाई दी। मेरे सहयात्री ने बताया कि यहां हर गाँव तक पीने का पानी सरकार ने पहुंचाया हुआ है, और घर–घर तक नल के माध्यम से पानी मिलता है। वह अपने गाँव मकडोली का ज़िक्र करते हुए बताने लगा कि उनके गाँव में पानी तब पहुंचा था जब पंजाब के मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों थे। पंजाब का पुनर्गठन होने से पहले हिमाचल का यह कांगड़ा क्षेत्र भी पंजाब का ही हिस्सा था।
वह आगे बताता है कि जमीन के नीचे से पानी निकालने के लिए सरकार ने कई ट्यूबवेल लगाए हुए हैं। ट्यूबवेल से पानी बड़ी–बड़ी टंकियों तक पहुंचाया जाता है, और वहां से आगे घरों तक सप्लाई होती है। इसके अलावा खेती के लिए सिंचाई का पानी देने के लिए भी अलग ट्यूबवेल लगाए गए हैं।
पोंग डैम के आसपास की जगहों में भूजल बहुत ऊपर है, लेकिन जैसे-जैसे ऊपर पहाड़ी इलाकों की ओर बढ़ते हैं, जमीन के नीचे पानी और गहरा होता जाता है। उसके मुताबिक उसका गाँव पोंग डैम से करीब 30 किलोमीटर दूर मुख्य सड़क से हटकर पश्चिम की ओर है। वह बताता है कि उसका इलाका सूखे जैसी स्थिति वाला है, क्योंकि वहां भूजल बहुत गहरा है।
सड़क के दोनों तरफ आबादी काफी बढ़ चुकी है। गाँव आपस में इतने पास–पास आ गए हैं कि अलग-अलग पहचानना मुश्किल हो रहा था। हालांकि गाँवों का आकार छोटा है। पहाड़ी घरों की पहचान समझी जाने वाली ढलानदार छतें अब बहुत कम दिखती हैं। ज़्यादातर घर पक्के और आधुनिक ढंग के बने हुए दिखाई देते हैं, जो लोगों की अच्छी आर्थिक स्थिति का संकेत हैं।
मेरे उसी सहयात्री ने आगे बताया कि इस क्षेत्र में पर्यटक बहुत कम आते हैं। यहां के ज़्यादातर लोग या तो फौज में हैं या फिर सरकारी और निजी नौकरियों के कारण बाहर रहते हैं, जबकि उनके परिवार गांवों में ही रहते हैं। वह स्वयं भी पिछले 42 साल से दिल्ली में नौकरी कर रहा है।
बातों ही बातों में उसने इस बस रूट के बारे में भी बताया कि जब से वह दिल्ली गया है, तब से यह रूट चल रहा है। बस रात 10:30 बजे दिल्ली से चलती है और सुबह 9 बजे तलवाड़ा पहुँचती है, फिर शाम तक चंबा। उसने यह भी कहा कि सड़कें भले ही अब पहले से बहुत बेहतर हो गई हैं, लेकिन इस बस का दिल्ली से चलने और चंबा पहुँचने का समय आज भी वही है — जितना समय यह 40 साल पहले लेती थी, उतना ही समय अब भी लगाती है।
बस आगे जसूर से पठानकोट होते हुए चंबा जा रही थी। बस में एक यात्री पठानकोट जाने वाला भी था, जो हमारे आगे वाली सीट पर बैठा था। मेरे सहयात्री ने उसे बड़ी सरल सलाह देते हुए कहा कि अगर पठानकोट जाना हो तो यह रूट सही नहीं है। दिल्ली से लुधियाना होकर जाने वाले रूट से चार घंटे कम समय में पठानकोट पहुँचा जा सकता है।
असल में, जो सहयात्री पहले चुप–सा बैठा था, अब अपने हिमाचल की वादियाँ देखते ही खुलकर बातें करने लगा था।
चलता ....
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ਗੁਡ ਭਾਈ sahib
ReplyDeleteThanks ji
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